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Shrimad Bhagavad Gita’s Summery of all Chapters

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Shrimad Bhagavad Gita’s Summery of all Chapters

Shrimad Bhagavad Gita” is a epic of knowledge. Now I would to tell you something about the chapters of “Shrimad Bhagavad Gita” like summary of every chapters. I hope you like to read this and feel joyful during reading. Shrimad Bhagavad Gita’s Summery of all Chapters

“श्रीमद्भगवद् गीता” ज्ञान का एक महाकाव्य है। अब मैं आपको “श्रीमद भगवद गीता” के अध्यायों के बारे में कुछ बताना चाहूँगा जैसे हर अध्याय का सारांश। मुझे आशा है कि आप इसे पढ़ना पसंद करेंगे और पढ़ने के दौरान आनंदित महसूस करेंगे।

18 अध्याय और उनका सारांश (18 Chapter and their summary)

1. कुरुक्षेत्र के योद्धस्थल में सैन्य निरिक्षण (Military inspection in Yudhsthal of Kurukshetra)

शक्तिशाली योद्धा अर्जुन युद्धाभिमुख विपक्षी सेनाओं में अपने निकट सम्बन्धियों , शिक्षकों तथा मित्रों को युद्ध में अपना-अपना जीवन उत्सर्ग करने के लिए उघत देखता है वह शोक तथा करुणा से अभिभूत होकर अपनी शक्ति खो देता है, उसका मन मोहग्रस्त हो जाता है और वह युद्ध करने के अपने संकल्प को त्याग देता है|

The powerful warrior Arjun sees his close relatives, teachers and friends in the war-oriented opposition forces to emit his life in battle. He loses his power, overwhelmed with grief and compassion, his mind is enraptured and that war Abandons his resolve to do. Shrimad Bhagavad Gita’s Summery of all Chapters

2. गीता का सार (Essence of Gita)

अर्जुन शिष्य-रूप में कृष्ण की शरण ग्रहण करता है और कृष्ण उससे नक्षवर भौतिक शरीर तथा नित्य आत्मा के मूलभूत अंतर की व्याख्या करते हुए अपना उपदेश प्रारम्भ करते है. भगवान उसे देहान्तरण की प्रक्रिया, परमेश्वर की निष्काम सेवा तथा स्वरूपसिद्ध व्यक्ति के गुणों से अवगत कराते हैं।

Arjuna takes refuge in Krishna as a disciple and Krishna starts his sermon by explaining the fundamental difference between him, the physical body and the eternal soul. God makes him aware of the process of devotion, the fruitless service of God and the qualities of a person who is self-respecting.

3. कर्मयोग (Karma yoga)

इस भौतिक जगत में हर व्यक्ति को किसी न किसी प्रकार के कर्म में प्रवृत्त होना पड़ता है | किन्तु ये ही कर्म उसे इस जगत में बांधते या मुक्त करते हैं | निष्काम भाव से परमेश्वर की प्रसन्नता के लिए कर्म करने से मनुष्य कर्म के नियम से छूट सकता है और आत्मा तथा परमेश्वर विषयक दिव्य ज्ञान प्राप्त कर सकता है |

In this material world every person has to engage in some kind of karma. But these actions bind or liberate him in this world. By doing deeds for the happiness of God in a senseless way, a person can get rid of the law of karma and can get divine knowledge about the soul and God. Shrimad Bhagavad Gita’s Summery of all Chapters

4. दिव्य ज्ञान (Divine knowledge)

आत्मा, ईश्वर तथा इन दोनों से सम्बंधित दिव्य ज्ञान करने, तथा मोक्ष प्रदान करने वाला है। ऐसा ज्ञान कर्मयोग का फल है।

The soul is the God and divine knowledge related to both of these, and is the one who provides salvation. Such knowledge is the result of karma yoga.

5. कर्मयोग-कृष्णभावनाभावित कर्म (Karmayoga – Krishna)

ज्ञानी पुरुष दिव्य ज्ञान की अग्नि से शुद्ध होकर बाह्यत: सारे कर्म करता है, किन्तु अंतर में उन कर्मों के फल का परित्याग करता हुआ शांति, विरतकी, सहिष्णुता, आध्यात्मिक दृष्टि तथा आनंद की प्राप्ति करता है।

The knowledgeable man purifies himself with the fire of divine knowledge and performs all deeds externally, but in the interim abandons the fruits of those deeds, attains peace, serenity, tolerance, spiritual vision and bliss. Shrimad Bhagavad Gita’s Summery of all Chapters
 

6. ध्यानयोग (Meditation)

अष्टांगयोग मन तथा इन्द्रियों को नियंत्रित करता है और ध्यान को परमात्मा पर केंद्रित करता है। इस विधि की परिणति समाधि में होती है।

Ashtanga Yoga governs the mind and the senses and focuses attention on the divine. This method results in samadhi. Shrimad Bhagavad Gita’s Summery of all Chapters

7. भगवद्ज्ञान (Mysticism)

भगवान् कृष्ण समस्त कारणों के कारण, परम सत्य हैं। महात्मागण भक्तिपूर्वक उनकी शरण ग्रहण करते हैं, किन्तु अपवित्र जन पूजा के अन्य विषयों की ओर अपने मन को मोड़ देते हैं।

Lord Krishna is the absolute truth due to all the reasons. Mahatmas devoutly take refuge in them, but unholy people turn their minds towards other subjects of worship.

8. भगवत्प्राप्ति (God recovery)

भक्तिपूर्वक भगवान् कृष्ण का आजीवन स्मरण करते रहने से और विशेषतया मृत्यु के समय ऐसा करने से मनुष्य परम धाम को प्राप्त कर सकता है।

By devotional remembrance of Lord Krishna devoutly and especially by doing so at the time of death, a person can attain the ultimate abode. Shrimad Bhagavad Gita’s Summery of all Chapters

9. परम गुह्म ज्ञान (Ultimate knowledge)

भगवान् श्रीकृष्ण परमेश्वर है और पूज्य हैं। भक्ति के माध्यम से जीव उनसे शाश्वत संबंध है। शुद्ध भक्ति को जागृत करके मनुष्य कृष्ण के धाम को वापस जाता है।

Lord Shree Krishna is God and is revered. Through devotion Jiva is an eternal relation to them. By awakening pure devotion, man goes back to the abode of Krishna.

10. श्रीभगवन का ऎश्वर्य (The glory of Shri Bhagavan)

बल, सौंदर्य, ऐश्वर्य या उत्कृष्टता प्रदर्शित करने वाली समस्त अद्भुत घटनाएँ, चाहे वे इस लोक में हों या आध्यात्मिक जगत में, कृष्ण की दैवी शक्तियों एवं ऐश्वर्यों की आंशिक अभिव्यक्तियाँ हैं। समस्त कारणों के कारण-स्वरुप तथा सर्वस्वरूप कृष्ण समस्त जीवों के परम पूजनीय हैं।

All the wonderful events that show strength, beauty, opulence or excellence, whether they are in this world or in the spiritual world, are partial manifestations of the divine powers and opulences of Krishna. Because of all the reasons – in nature and as a whole, Krishna is the supreme worshiper of all beings. Shrimad Bhagavad Gita’s Summery of all Chapters

11. विराट रूप (Vast form)

भगवान् कृष्ण अर्जुन को दिव्य दृष्टि प्रदान करते हैं और विश्व-रूप में अपना अद्भुत असीम रूप प्रकट करते हैं। इस प्रकार वे अपनी दिव्यता स्थापित करते हैं। कृष्ण बतलाते हैं कि उनका सर्व आकर्षक मानव-रूप ही ईश्वर का आदि रूप है। मनुष्य शुद्ध भक्ति के द्वारा ही इस रूप का दर्शन कर सकता है।

Lord Krishna gives divine vision to Arjuna and reveals his amazing infinite form in the world-form. Thus they establish their divinity. Krishna states that his all-encompassing human form is the original form of God. A person can see this form only through pure devotion.

12. भक्तियोग (Devotion)

कृष्ण के शुद्ध प्रेम को प्राप्त करने का सबसे सुगम एवं सर्वोच्च साधन भक्तियोग है। इस परम पथ का अनुसरण करने वालों में दिव्य गुण उत्पन्न होते है।

Bhakti Yoga is the easiest and highest means to achieve pure love of Krishna. Divine qualities arise in those who follow this ultimate path. Shrimad Bhagavad Gita’s Summery of all Chapters

13. प्रकृति, पुरुष तथा चेतना (Nature, man and consciousness)

जो व्यक्ति शरीर, आत्मा तथा इनसे भी परे परमात्मा के अंतर को समझ लेता है, उसे इस भौतिक जगत से मोक्ष प्राप्त होता है।

A person who understands the difference between body, soul and God beyond these, gets salvation from this material world.

14. प्रकृति के तीन गुण (Three qualities of nature)

सरे देहधारी जीव भौतिक प्रकृति के तीन गुणों के अधीन हैं-ये हैं सतोगुण, रजोगुण तथा तमोगुण। कृष्ण बतलाते हैं कि ये गुण क्या हैं ? ये हम पर किस प्रकार क्रिया करते है ? कोई इनको कैसे पार कर सकता है ? और दिव्य पद को प्राप्ति के कौन -कौन से लक्षण हैं ?

All bodily beings are subject to three qualities of physical nature – these are Satoguna, Rajoguna and Tamoguna. Krishna explains what are these qualities? How do they act on us? How can anyone overcome them? And which are the signs of attaining divine rank?

15. पुरुषोत्तम योग (Purushottam Yoga)

वैदिक ज्ञान का चरम लक्ष्य अपने आपको भौतिक जगत के पाश से विलग करना तथा कृष्ण को भगवान् मानना है। जो कृष्ण के परम स्वरुप को समझ लेता है, वह उनकी शरण ग्रहण करके उनकी भक्ति में लग जाता है।

The ultimate goal of Vedic knowledge is to separate oneself from the loop of the material world and consider Krishna as God. One who understands the supreme nature of Krishna, takes refuge in him and engages in his devotion. Shrimad Bhagavad Gita’s Summery of all Chapters

16. दैवी तथा आसुरी स्वाभाव (Divine and demonic nature)

शास्त्रों के नियमों का पालन न करके मनमाने ढंग से जीवन व्यतीत करने वाले तथा आसुरी गुणों वाले व्यक्ति अधम योनियों को प्राप्त होते हैं और आगे भी भवबंधन में पड़े रहते हैं। किन्तु दैवी गुणों से सम्पन्न तथा शास्त्रों को आधार मानकर नियमित जीवन बिताने वाले लोग आध्यात्मिक सिद्धि प्राप्त करते हैं।

By not following the rules of the scriptures, people who lead arbitrary lives and possess devilish qualities get to the unholy vaginas and continue to remain in bondage. But those who are blessed with divine qualities and based on the scriptures, and those who live a regular life, achieve spiritual accomplishment.

17. श्रद्धा के विभाग (Department of reverence)

भौतिक प्रकृति के तीन गुणों से तीन प्रकार की श्रद्धा उत्पन्न होती है। रजोगुण तथा तमोगुण में श्रद्धापूर्वक किये गए कर्मों से अस्थायी फल प्राप्त होते हैं, जबकि शास्त्र-सम्मत विधि से सतोगुण में रहकर संपन्न कर्म ह्रदय को शुद्ध करते हैं। ये भगवान् कृष्ण के प्रति शुद्ध श्रद्धा तथा भक्ति उत्पन्न करने वाले होते हैं।

Three types of reverence arise from the three qualities of material nature. The deeds performed reverently in Rajoguna and Tamoguna yield temporary results, while the scriptures and purification practices purify the heart by staying in Satoguna. They are supposed to generate pure devotion and devotion towards Lord Krishna. Shrimad Bhagavad Gita’s Summery of all Chapters

18. उपसंहार – संन्यास की सिद्धि (Epilogue – completion of retirement)

कृष्ण वैराग्ये का अर्थ और मानवीय चेतना तथा कर्म पर प्रकृति के गुणों का प्रभाव समझाते हैं। वे ब्रह्म-अनुभूति, भगवदगीता की महिमा तथा भगवदगीता के चरम निष्कर्ष को समझाते हैं। यह चरम निष्कर्ष यह है कि धर्म का सर्वोच्च मार्ग भगवान् कृष्ण की परम शरणागति है जो पूर्ण प्रकाश प्रदान करना वाली है और मनुष्य को कृष्ण के नित्य धाम को वापस जाने में समर्थ बनाती है।

Krishna explains the meaning of Vairagye and the effect of the qualities of nature on human consciousness and karma. They explain the Brahman-realization, the glory of the Bhagavad Gita and the extreme conclusion of the Bhagavad Gita. This extreme conclusion is that the supreme path of Dharma is the ultimate refuge of Lord Krishna, which is to provide full light and enables man to return to the eternal abode of Krishna.